राज्य विज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मेलन २०१८

राज्य विज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मेलन (उत्तराखण्ड राज्य के जल स्त्रतोः दशा एवं दिशा पर वैज्ञानिक विमर्श व क्रियान्वयन ),आयोजन स्थल - ग्राफिक एरा,देहरादून



राज्य विज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मेलन


मानव जीवन में जल का स्थान तथा महत्व सर्वविदित है और केवल मानव ही नहीं, समस्त जीवजग्त जल पर आश्रित है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति ही पानी में हुई। जीवन शब्द का अर्थ ही है पानी। प्रकृति ने हमें पानी प्रचुर परिमाण में दिया है। पृथ्वी की सतह का लगभग तीन चौथाई भाग समुद्री जल से आच्छादित है जहाँ 14,00,000 X1.00E+15 किग्रा जल है। यह पृथ्वी के कुल जल का 97 प्रतिशत है। शेष 3 प्रतिशत जल खुली जमीन पर है तथा वही मनुष्य के जीवन के लिये आवश्यक एवं उपयोगी है। उसमें भी 43000X1.00E+15 किग्रा जल हिम के रूप में जमा है। नदियों में 1X1.00E+15, मिट्टी में 80X1.00E+15, झीलों में 60X1.00E+15, जीवों एवं वनस्पतियों में 2X1.00E+15, जमीन के अन्दर 15000X1.00E+15 तथा वायुमण्डल में 15X1.00E+15, किग्रा0 जल की मात्रा है। इसके अतिरिक्त कुछ मात्रा में जल OH आयनों के रूप में खनिजों में भी बंधा होता है। लगभग यह सारा जल एक चक्रीय क्रम में रूप और स्थान बदलते हुए चलता रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर पानी आज से अरबों वर्ष पूर्व लगभग पृथ्वी के निर्माण के साथ ही बन गया था, परन्तु इस जल चक्र के कारण खनिजों के अतिरिक्त पृथ्वी पर पानी का कोई भी मुक्त अणु तीन हजार वर्ष से पुराना नहीं है। वैज्ञानिकों ने जो दूसरी बात बताई वह यह है कि अरबों वर्ष पूर्व जितना पानी पृथ्वी पर बना आज भी लगभग उतना ही है। नये पानी का बनना या पहले पानी का नष्ट होना यद्यपि होता तो है परन्तु उसकी मात्रा अत्यन्त अल्प होती है और एक दूसरे को सन्तुलित कर देती है। अतः पृथ्वी पर पानी की कुल मात्रा पिछले अरबों वर्षों में लगभग स्थिर है। ऐसा होते हुए भी आज हम जल की समस्या से जूझ रहे है। पृथ्वी पर अनेक भागों में पीने योग्य पानी कम हो रहा है, ऐसा दिखता है। जल स्रोत सूख रहे है। नदियों में जल कम हो रहा है। बर्फ तेजी से पिघल रही है। भूमिगत जल का स्तर नीचे जा रहा है। तो फिर यदि पानी की कुल मात्रा में कमी नहीं होती तो पानी जा कहाँ रहा है? और यदि पानी की समस्या हो रही है या बढ़ रही है तो हमें उसका सामना करने के लिये क्या करना चाहिए? प्रश्न बहुत व्यापक है। और संसार के हर भाग के लिये हैं, परन्तु इसकी चर्चा जैसे वैश्विक स्तर पर होनी चाहिए वैसे ही स्थानीय स्तर पर भी आवश्यक हैं। हर स्थान की भौगोलिक, भूगर्भीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थिति के अनुसार समस्याओं की दशा में भिन्नता होती है और इसलिये उनके समाधान की दिशाओं में भी भिन्नता होगी। उत्तराखण्ड भी जल की इस समस्या से प्रभावित है इसलिये इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करने के लिये, समस्याओं के स्वरूप को समझने तथा सम्भावित उपायों पर विमर्श करने के उद्देश्य से प्रस्तुत बृहत वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस सम्मेलन में विज्ञान के विद्यार्थी, शिक्षक, वैज्ञानिक, अशासकीय संगठनों के कार्यकर्ता तथा पानी के किसी भी पहलू पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ता आमन्त्रित हैं। जो अपने-अपने क्षेत्रों की अपने अनुभवों तथा अध्ययनों के आधार पर चर्चा करेंगे तथा एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान कर समाधान के मार्ग खोज कर उन पर चलेंगे। हमें विश्वास है कि सम्मेलन में होने वाली चर्चाओं के निष्कर्ष स्वरूप हम कुछ ठोस प्रस्ताव शासन के सम्मुख कार्यान्वयन के लिये प्रस्तुत कर सकेंगे।

सम्मेलन में विचारणीय उप विषय


1. हिमनद- स्वरूप एवं समस्यायें
2. नदियाँ- स्वरूप एवं समस्यायें
3. लघु जल प्रवाह (नौले, गदेरे आदि)- स्वरूप एवं समस्यायें
4. भूमिगत जल - स्वरूप एवं समस्यायें
5. ऊष्ण जल स्रोत- स्वरूप एवं समस्यायें
6. जल उपयोग एवं दुरुपयोग
7. जल प्रदूषण

सम्मेलन में प्रस्तुति

शोध पत्र प्रस्तुति


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आप शोध पत्र का शीर्षक तथा अधिक से अधिक 200 शब्दों में सारांश दिनांक 15 फरवरी 2018 तक भेज दें......

आप शोध पत्र का शीर्षक तथा अधिक से अधिक 200 शब्दों में सारांश दिनांक 20 फरवरी 2018 तक भेज दें। प्रस्तुति के लिये 10 मिनट का समय दिया जायेगा तथा 5 मिनट चर्चा होगी। एल.सी.डी. एवं प्रोजेक्टर की व्यवस्था उपलब्ध होगी।

पोस्टर प्रस्तुति


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पोस्टर प्रदर्शन हेतु 1मीग1मी का स्थान उपलब्ध किया जायेगा। लगाने की व्यवस्था आपको करनी होगी......

पोस्टर प्रदर्शन हेतु 1मीग1मी का स्थान उपलब्ध किया जायेगा। लगाने की व्यवस्था आपको करनी होगी। चर्चा हेतु शोधकर्ता को उपस्थित होना होगा। कृपया पोस्टर का विषय एवं कथ्य का सारांश सूचित करें।

माॅडल प्रस्तुति


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मॉडल प्रदर्शित करने के लिये भी स्थान उपलब्ध होगा।.....

मॉडल प्रदर्शित करने के लिये भी स्थान उपलब्ध होगा। मॉडल चलाने आदि की व्यवस्था प्रस्तुतकर्ता को स्वयं करनी होगी।

आयोजक

उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंघान केन्द्र,(यूसर्क),देहरादून

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